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मोरिंगा (सहजन)

मोरिंगा (सहजन) का पेड़ मध्यम आकार का होता है, जिसकी लंबाई 4-10 मीटर तक हो सकती है और यह सूखा-प्रतिरोधी होता है। कलम से लगाए जाने पर, यह रोपण के लगभग 6-8 महीने बाद फल देना शुरू कर सकता है, जबकि बीज से लगाए जाने पर फल आने में लगभग 5-9 महीने का समय लग सकता है। पहले वर्ष में उपज कम होती है, लेकिन दूसरे वर्ष तक यह लगभग 300 फलियाँ और तीसरे वर्ष तक 400-500 फलियाँ पैदा कर सकता है।ऊंचाई: लगभग 10-12 मीटर तक बढ़ सकता है।
आकृति: इसका मुकुट फैला हुआ और छतरी जैसा होता है।
छाल: चिकनी, धूसर और कांटेदार हो सकती है।
पत्तियां: पंखदार, गहरे हरे रंग की और अंडाकार होती हैं।
फल: लंबी, पतली और हरी फलियां होती हैं, जो पकने पर भूरी हो जाती हैं। इन्हें ड्रमस्टिक भी कहते हैं।
बीज: गोल, तैलीय और तीन पंखों वाले होते हैं, जो परिपक्व फल से बाहर निकलते हैं।

मोरिंगा (Moringa oleifera) जिसे हिंदी में सहजन, सुजना या मूँगफली का पेड़ भी कहा जाता है, एक बहुउपयोगी पौधा है — इसकी फली, पत्तियाँ, फूल, बीज और जड़ सभी उपयोगी हैं।
इसे “मिरेकल ट्री” (अद्भुत वृक्ष) भी कहा जाता है क्योंकि यह पोषक तत्वों और औषधीय गुणों से भरपूर होता है।

मोरिंगा (सहजन) की खेती की पूरी जानकारी

1. परिचय

  • वैज्ञानिक नाम: Moringa oleifera
  • परिवार: Moringaceae
  • सामान्य नाम: Drumstick Tree / Sahjan
  • उपयोग:
    • सब्जी के रूप में फलियाँ
    • औषधीय पौधा (बीज व पत्तियाँ)
    • पशु चारा
    • पौष्टिक पूरक (Nutrition supplement)

2. भारत में प्रमुख क्षेत्र

  • तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और ओडिशा।
  • भारत दुनिया का सबसे बड़ा मोरिंगा उत्पादक देश है।

3. जलवायु और मिट्टी की आवश्यकता

घटकविवरण
जलवायुगर्म और शुष्क उपोष्णकटिबंधीय या उष्णकटिबंधीय
तापमान25°C – 35°C
वर्षा500 – 1200 मिमी
मिट्टीहल्की दोमट या बलुई दोमट, जल निकासी वाली मिट्टी
pH स्तर6.0 – 8.0

जलभराव सहन नहीं करता। सूखी और थोड़ी ढलान वाली भूमि बेहतर रहती है।

4. प्रजातियाँ (Varieties)

किस्मविशेषता
PKM-1 (Tamil Nadu)सबसे लोकप्रिय हाइब्रिड, 6–8 महीने में फलियाँ तैयार
PKM-2लंबी फलियाँ (45–60 से.मी.), अधिक उत्पादन
ODC-3 / Bhagya / Coimbatore-1उच्च उत्पादन और सूखे सहनशील

5. खेती की विधि

रोपण के तरीके

  1. बीज द्वारा:
    • बीजों को सीधे खेत में बोया जा सकता है।
    • अंकुरण 7–10 दिन में होता है।
  2. कटिंग द्वारा:
    • 1–1.5 मीटर लंबी डंडी (stem cutting) लगाई जाती है।
    • सूखी भूमि में यह तरीका बेहतर रहता है।

रोपण समय:

  • बरसात की शुरुआत (जून–जुलाई) या
  • सिंचित क्षेत्रों में फरवरी–मार्च।

दूरी:

  • सब्जी के लिए: 2.5 x 2.5 मीटर
  • बीज/औद्योगिक उद्देश्य के लिए: 4 x 4 मीटर

6. खाद और सिंचाई

  • खाद:
    • प्रति गड्ढे में 10–15 किलो गोबर खाद।
    • प्रति पौधा प्रति वर्ष 100 ग्राम नाइट्रोजन, 50 ग्राम फॉस्फोरस, 50 ग्राम पोटाश।
  • सिंचाई:
    • शुरुआती 2–3 महीने नियमित।
    • बाद में आवश्यकता अनुसार (15–20 दिन के अंतराल पर)।

7. फूल और फल लगना

  • बीज से लगाए पौधे: 6–8 महीने में फल देना शुरू करते हैं।
  • कटिंग से लगाए पौधे: 4–6 महीने में फलियाँ।
  • उत्पादन 3–4 साल तक लगातार बढ़ता है।

8. कटाई और उत्पादन

विवरणअनुमानित मात्रा
पहली फसल6–8 महीने में
प्रति पौधा उत्पादन40–100 फलियाँ प्रति वर्ष
प्रति एकड़ उत्पादन10 – 15 टन हरी फलियाँ प्रति वर्ष
औसत बाजार मूल्य₹15 – ₹40 प्रति किलो (सीजन के अनुसार)
शुद्ध लाभ₹1.5 – ₹3 लाख प्रति एकड़ / वर्ष

9. रोग और कीट नियंत्रण

समस्यानियंत्रण
फल छेदक कीटनीम तेल 5% का छिड़काव करें
पत्तों पर फफूंदी / पीलापनबोर्डो मिक्सचर या जैव फफूंदीनाशक का प्रयोग
टिड्डी व सफेद मक्खीनीम आधारित कीटनाशक स्प्रे करें

10. औद्योगिक उपयोग

  • बीजों से तेल (Ben oil) निकाला जाता है — यह इत्र और कॉस्मेटिक उद्योग में उपयोगी है।
  • पत्तियाँ: पाउडर बनाकर “मोरिंगा पाउडर” बेचा जाता है (एक्सपोर्ट प्रोडक्ट)।
  • फली: सब्जी और ड्राई फॉर्म में दोनों रूप में बाजार में बिकती है।

11. सरकारी सहायता और प्रशिक्षण

  • National Horticulture Board (NHB) — बागवानी फसलों पर अनुदान (subsidy) देता है।
  • ICAR – Horticultural Research Station (Periyakulam, TN) — PKM-1, PKM-2 किस्में विकसित कीं।
  • राज्य बागवानी विभाग — पौधे, प्रशिक्षण और तकनीकी सहायता प्रदान करते हैं।

संक्षेप में फायदे

  • 6–8 महीने में फसल तैयार।
  • कम लागत में अधिक मुनाफा।
  • पत्तियाँ, फलियाँ, बीज — सब बिकने योग्य।
  • सूखे क्षेत्रों में भी सफल खेती।
  • औषधीय, पोषक और निर्यात योग्य फसल।

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